Monday, February 14, 2011

ठिठुरती रात में करवटे बदल रहा हूँ ,
जाग रहा हूँ कब से उंनीदी आंखे लिए ,
घबराहट के छींटे अब भी भिगोये हुए है माथे को ,
एक ख्याल ने ख्वावो का रास्ता रोक रखा है ||

कल तक बड़ी ख़ामोशी हुआ करती थी इस कमरे में ,
आज डर रहा हूँ कोई जाग न जाये धड़कनों के शोर से,
कभी कुछ बड़बड़ा रहा हूँ , तो कभी कोसता हूँ अपने आप को,
कभी हाथ रख कर सीने पर खुद को समझा भी रहा हूँ ||

न जाने कितने घंटे बिताये है आईने के सामने ,
न जाने कितने कागज़ रंगे है कुछ ख्याल लिखने के लिए ,
कल वो वक्त है , कल ही वो घड़ी है,
बहुत महनत की है बस एक बात कहने के लिए ||

रात का अँधेरा छट गया है , सुबह का सूरज भी निकल आया है ,
रात की घबराहट और धड़कनों का शोर कुछ नया ही रंग लाया है ,
कुछ नहीं बस आज उनसे प्यार की बात करना है,
कुछ नहीं बस आज उनसे प्यार का इज़हार करना है || 

Post a Comment