Sunday, October 11, 2009

तीन दिन बंगलोर के ....


नमस्कार ,
आज बहुत दिनों के बाद समय की चादर से कुछ वक़्त के ख्वाव चुरा के लाया हूँ | इस वक़्त का सबसे सही उपयोग आप सभी को चिट्ठी लिखने में करू ऐसे विचार के साथ मैं ये पत्र प्रारंभ कर रहा हूँ | पिछले गुज़रे ३ घंटो में मैंने पिछले ३ दिनों के सफ़र का मंथन किया है | यहाँ ऊची-ऊची इमारते है , वाहनों का शोर है , भीड़ है, लोग ही लोग है | घड़ी की रफ़्तार अब पहले से तेज़ हो गई है , नीला प्यारा आसमान अब उदास सा है, क्योकि अब वो तुम्हारे साथ खेल नहीं सकता है | चलने वाली ठंडी पवन से अब थोडी जलन होने लगी है , क्योकि जानते है की किस्मत में अब केवल मशीनी हवा की ही राज होने वाला है | पेड़ है, हरियाली है पर ना जाने क्यों नयनो को सकुन नही है | हर तरफ भीड़ है , लोग है, इंसान है , जिसे किसी घने जंगल में ढेरो वृक्ष खड़े खड़े हो | लेकिन फिर भी इस जंगल में हल पेड़ अकेला है , तन्हा है | कभी कभी तन्हा होना बेहतर है , भीड़ में तन्हाई के अहसास के साथ जीने से क्योकि वो शायद आपको और भी अकेला बना देता है | फिर वो कानो में लगाये हेद्फोने के साथ लोगो की भीड़ को चीरता हुआ , आस पास के शोर को नज़रंदाज़ करता हुआ, उन ऊची - ऊची इमारतो में से किसी १ में चला जाता है | और फिर वो उन लोगो से मिलता है जिनके कारण वो इस शहर में आया है | अब भीड़ , भीड़ नही लगती | तन्हाई उन चेहरों के देखने के बाद कहाँ गुम हो गई आप को इस बात का अहसास भी नही होता | अब पेडो पर हरियाली के साथ पंछी भी नज़र आने लगे है | आसमान से गिरती बारिश अब आप को आप के आने का सन्देश लगने लगती है | बहने वाली हवा मनो ऐसी लगती है जैसे वो इससे पहले इतनी सुकून भरी कभी थी ही नही | फिर गुजरी पिछली सारी बाते , पुराने सारे किस्से , आने वाले सारे सपने इन सब का दौर चलता है | और आखिर में फिर आप समय की चादर ओढ़ लेते हो और चुराए हुए वक़्त के सारे ख्वाव रात के साथ बीत जाते है |

गुमनाम
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