Thursday, November 26, 2009

उदास मन


नमस्कार,
ना जाने क्यों मन कभी उदास सा रहता है , और इस उदासी में वो पता नही क्यों बहुत खामोश हो जाता है | जँहा बोलना होता है वंहा भी नही बोलता , लफ्ज़ ना जाने क्यों इतने आलसी हो जाते है की होंटो से फुंटने में भी मायूसी सी ज़ाहिर करने लगते है | ख्यालो की जील से कोई विचार ही नही उमड़ता है , लगता है मनो जैसे इसे शीतलहर ने अपनी चपेट में ले लिया हो , सब कुछ जम सा गया हूँ , चारो और कुछ और नही बस कटीली , कठोर बर्फ हो | सब कुछ थम सा गया हो , लगता है मानो किसी भूकंप की जरूरत है इस बर्फ को तोड़ने के लिए , अपने जीवन को फिर से गतिमान करने के लिए , विचारो की धारा को फिर से प्रवाहित होने देने के लिए | लेकिन सवाल ये है की आखिर ये मन उदास क्यों है ? वो मस्तिस्क जो हमेशा विचारशील हुआ करता था आज इतना शांत क्यों है ? कंही ये उदासी इस दुनिया में लगी जीत और हार की दौड़ के कारण तो नही है | किसी ने मुजसे १ बार कहा था की ,
जो आँखों को आंसुओ फल दे ,
ऐसे सपनो पेड़ के उगाने का फायेदा क्या है ,
जो लूट ले आधी जिंदगी मुजसे मेरी,
ऐसी जीत हार के मायेने क्या है ||
१ बार मुजसे किसी ने पुछा की २ लोगो की मौत हुई और दोनों ने मरते वक़्त दो अलग - अलग बाते बोली
१) "मैं बहुत खुश हूँ "|
२) "मैं सफल हूँ " |
मैं नही जानता किसने अपना जीवन जिया और किसने अपने जीवन को दौड़ में खर्च कर दिया | मैं तो बस इतना जनता हूँ की उदास मन कचोटता है , सवाल पूछता है और तन्हा कर देता है |
अब बस इन्ही कामनाओ के साथ की आप के जीवन के सपनों के पेड़ हमेशा खुशियो के फल दे और उनपे सफलताओ के फूल फलते रहे और आप के ख्यालो की जील पे सुख का सूरज हमेशा जगमगाते रहे | मैं अपने सवालो को यंही विराम देता हूँ |
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