Saturday, December 10, 2011

ख्वाबो का डर





न जाने क्यों एक बैचेनी सी है ,
न जाने क्यों कुछ घबराहट सी है ,
कुछ भी तो नहीं है जो टुटा हुआ है ,
कुछ भी तो नहीं जो बिखर गया हो||

न जाने क्यों कंही कुछ तो सता रहा है ,
कुछ तो बैचेनी सी है , कुछ बेख्याली सी है ,
पर इतना उदास क्यों है तू ,
कुछ ख्वाब ही तो है ,कुछ ख्याल ही तो है ||

शायद डर है ये ख्वाब बिखर न जाये ,
डर है कोशिशों की डोर टूट न जाये ,
शायद पुराने टूटे ख्वाबो के निशान अभी तक गए नहीं है ,
शायद नाकाम कोशिशे अब भी डरा रही है ||

पर ऐ दिल, तू क्यों इतना घबराता है ,
हिम्मत रख, रख भरोसा अपने आप पर ,
ख्वाब देखे है न तुने, तेरा हक है वो ,
ख्वाब पुरे भी होंगे, बस कोशिश करता रह ||
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