Wednesday, September 21, 2011

मैं यु ही तुमसे मिलता रहूँगा















कितनी जादूगरी सी है तेरी आवाज़ में , 
जता देती है तेरे मन का सारा हाल ये ||
कितनी कशिश है तेरी इस आवाज़ में , 
जता देती है सारे ख्वाव, ख्याल जस्बात ये ||
सुन कर तेरी हंसी, मेरे होटो पर भी मुस्कुराहट आ जाती है , 
तेरी सिसकिया, मेरी आँखों को भी नम कर देती है ||

कितनी माहिर कारीगर है आवाज़ तेरी , 
मेरी ज़हन में एक तस्वीर सी उकेर देती है ||
आंखे बंद करू तो तेरा चहरा नज़र आ जाता है , 
हाथ बड़ाउ तो शायद छु भी लू उसे ||
हजारो मीलो की दुरिया है ये शायद , 
पर शायद सबसे छोटी हजारो मीलो की दुरिया है || 

सुन सकता हूँ मैं आवाज़ उस हवा की , 
जो गुजरी है तेरी ज़ुल्फो से होकर , 
न जाने कैसे सफ़र कर लेती है वो मेरे घर तक, 
महसूस कर लेता हूँ तेरी ज़ुल्फो की खुशबु उनमे ||
छुता है जब भी कोई हवा का टुकड़ा मुजे , 
जाता देता है की वो तुज़े छु कर आया है || 

हमारे ख्याल है ये , हमारे ख्वाव है ये , 
ये रफ़्तार के मोहताज़ नहीं , ये दुरियो के गुलाम भी नहीं है ||
क्या हुआ जो यु तेरा मिलना मुजसे मुक्मल नहीं ,
तेरी आवाज़ से तो मुलाकात हो ही जाती है ||
तुम यु ही मुज़से बाते करते रहना, मुस्कुराते रहना , 
मैं यु ही सांस लेता रहूँगा, लिखता रहूँगा, तुमसे मिलता रहूँगा ||




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