Friday, September 2, 2011

क्या रखा है हकीकत में जी कर

जीना सीखा है ख्बवो में रहकर हमने ,
क्या रखा है हकीकत में जी कर ,
खोजते रहते थे जिन्दगी का फलसफा हम भी ,
पाया भी जो उसको तो खुद को खोकर ||

बाटता रहता है जमाना खुशियों की जड़ी बूटी ,
पीना पड़ता है उसको भी गला घोटकर ,
कहते रहते है जमाने से की (मैं खुश हूँ),
क्या पाया है तुमने इतना खुश होकर ||

कुछ फायदा नहीं है उन्हें पुकारने से बार -बार ,
आते नहीं बिछड़े लम्हे वापस लौटकर ||
बस एक बार हकीकत ख्वाब सी लगी  थी मुजह्को,
जब गुज़रे थे वो हमको युही छुकर ||

इसलिए ही कहता हो यारो ख्वाबो मैं जी लो ,
क्या रखा है हकीकत में जी कर ||
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