Monday, December 30, 2013

मैं और वक़्त



तकता रहता हूँ घड़ी को जब मैं,
ये वक़्त है की गुज़रता ही नहीं,
ये सुईया है जिनका बढ़ने का मन ही नहीं है,
सेकंड कि सुई भी कुछ धीमी सी गुज़रती है॥

जब नहीं देख रहा होता हूँ मैं इस घड़ी को,
यु भाग जाता है वक़्त जैसे कोई आंधी हो,
के पूरा पहर बस एक लम्हे में बीत गया,
जैसे चुकाया हो खामियाजा उस धीमे गुज़रे वक़्त का॥

जब भी होता हूँ मैं तन्हा, एक लम्हा आकर बैठ जाता है मेरे संग,
तकता रहता है वो मुझको या निहारता रहता है,
और मैं झांकता रहता हूँ ना जाने किस शून्य में,
घंटो, पहरो बस यूँ ही बीत जाते है और वो चला जाता है ,
और ज़िंदगी कि रेत से एक लम्हा घट जाता है,

जब होता हूँ मैं किसी इंसान के संग ,
हमसफ़र , हमराही या सफ़र का साथी,
या मैं कहु  दोस्त, साथी, मित्र या साझेदार,
ये यु भाग जाता है जैसे किसी रेस में अव्वल आना हो,
या चुरा कर नज़रे बच के जाना चाहता हो कंही दूर॥

बड़ा अजीब सा मिजाज़ है इस वक़्त का,
बड़ा अजीब सा नाता है इसका और मेरा,
के तन्हाई में बैठा रहता है संग मेरे निहारता रहता है मुज़को,
जब तन्हाई नहीं तो औरो से जलता है, नज़रे चुराता है, भाग जाता है,
कंही इस वक़्त को मुझसे इश्क तो नहीं ॥ 
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