Friday, February 5, 2010

इस बार बहुत तन्हा सर्दी आई है


ठिठुरी सुखी नीद पड़ी है ,
रात की सर्दी छाई है ,
सपनो की कोई चादर दे दो ,
इस बार बहुत तन्हा सर्दी आई है ||

पुराने सूखे ख्वाब जोड़ कर ,
एक अँगीठी जलाई है ,
टूटे सूखे ख्वाब सुलग रहे है ,
मन ने कैसी आग लगाई है ,
अब तो कोई और दवा दो यारो ,
इस बार बहुत तन्हा सर्दी आई है ||

रात भर की बात सन्नाटो के संग ,
उफ़ ये कैसी ख़ामोशी छाई है ,
रूठे रूठे से ख्वाब पड़े है ,
कैसी ये रुसवाई है ,
अब तो सूरज की किरने फूटे ,
इस बार बहुत तन्हा सर्दी आई है ||
इस बार बहुत तन्हा सर्दी आई है ||
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