Sunday, August 15, 2010

जीवन के चार पहिये




दिन भर दिन ने काम किया ,
घड़ी थी, रात से मिलने जाने की ,
सांझ का बालक लौट आया था ,
मांग थी अब कुछ खाने की ||

अँधेरे की दाल चड़ी थी ,
चाँद की रोटी बेली थी ,
सितारों की भाजी कटी ,
रात भी वो अलबेली थी ||

दोपहर की दीदी ने ,
दिन-भर सांझ को सताया था ,
रात को सर पर हाथ फेर कर ,
मिल बाट के खाना खाया था ||

ऐसे ही कुछ जीवन बिता ,
एक दूजे के प्यार में ,
चारो ने अपना कर्म निभाया ,
रहे सुखी संसार में ||
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